Sunday, 18 February 2018

अब तेरा शहर कहाँ है?

संभाल के जिसे नज़रों में
दूर बहुत निकल आये थे,
वही रास्ते पूछते हैं
अब तेरा शहर कहाँ है?
सर्दियों की कांपती सुबह
कुल्हड के गरम एहसास
चटक मठरी के हसीन जायके ,
चौराहें की अठखेलियाँ
नुक्कड़ों के वायदें
मंज़िलों की धूल पूछती है
अब तेरा शहर कहाँ है?
माँ के दुपट्टे से मुँह ढ़ापे
दुपहरी की धूप सेकनें
औधें पड़े रहना चटाइयों पे ,
पतंगों से घिरा वो
रंगीला आसमान
सद्दी और मांझे की
अज़ब लड़ाइयाँ।
चली आयी यादें सभी
एक संदूक में भर के
वही संदूक पूछता है
अब तेरा शहर कहाँ है?